प्रथम विश्वयुद्ध 1914-1918 ई० (First World War 1914-1918 A.D.)
संक्षिप्त परिचय-प्रथम विश्वयुद्ध 28 जुलाई, 1914 ई० को प्रारम्भ हुआ था और 11 नवम्बर, 1918 ई० को यह समाप्त हुआ था। यह युद्ध बीसवीं शताब्दी के दूसरे दशक की सर्वाधिक महत्वपूर्ण घटना थी।
ऐतिहासिक पृष्ठभूमि – विश्व की साम्राज्यवादी शक्तियों की विस्तारवादी महत्वाकांक्षा तथा अपने उद्योगों व व्यापार को संरक्षण देने की प्रवृत्ति के कारण यूरोपीय शक्तियों में परस्पर टकराव होते रहे जिस कारण यूरोप तनावग्रस्त होता गया। अनेक राष्ट्रों में मनमुटाव तथा ईर्ष्याभाव बढ़ता ही गया। 20वीं शताब्दी के प्रथम दशक तक दो गुट बन गए थे। सर्वप्रथम 1882 ई० में जर्मनी के नेतृत्व में जर्मनी, ऑस्ट्रिया-हंगरी और इटली ने मिलकर त्रिपक्षीय गठबन्धन (Triple Alliance) बनाया। त्रिगुट के
विरोध में 1907 ई० में फ्रांस, इंग्लैण्ड तथा रूस ने त्रिपक्षीय मैत्री या समझौता (Triple Entente) कर लिया।
इन दोनों गुटों की पारस्परिक प्रतिस्पर्धा, टकराव तथा अन्तर्विरोध ने विश्व में युद्ध की पृष्ठभूमि तैयार कर दी।
•प्रथम विश्वयुद्ध का तात्कालिक कारण तो सेराजेवो में 28 जून, 1914 ई० को ऑस्ट्रिया के युवराज आर्कड्यूक फ्रांसिस फर्डीनेंड की हत्या थी। लेकिन युद्ध के आधारभूत कारण तो काफी पहले से ही तैयार हो गए थे। 28 जुलाई, 1914 ई० को युद्ध शुरू होने पर इटली ने दूसरे गुट के देशों का साथ दिया। जापान, तुर्की, संयुक्त राज्य अमेरिका आदि राष्ट्र भी इसमें कूद पड़े। इतना ही नहीं, साम्राज्यवादी राष्ट्रों ने अपने उपनिवेशो (colonies) को भी युद्ध में घसीट लिया। प्रथम विश्वयुद्ध महाविनाशकारी युद्ध था। अरबों रुपए की सम्पत्ति नष्ट हुई और लाखों लोग मारे गए युद्ध की अवधि 4 वर्ष से भी अधिक रही।
प्रथम विश्वयुद्ध के कारण (Causes of First World War)
1. यूरोप का दो सशस्त्र गुटों में विभाजन-गुटबन्दी की नीति का जन्मदाता जर्मनी का बिस्मार्क था। उसने 1879 ई० में ऑस्ट्रिया के साथ द्विपक्षीय गठबन्धन (Dual Alliance) की, जिसका उद्देश्य फ्रांस से जर्मनी की सुरक्षा करना था। 1882 ई०. में इस गुट में इटली को भी सम्मिलित कर लिया गया। इस प्रकार प्रसिद्ध त्रिपक्षीय गठबन्धन (Triple Alliance) का निर्माण हो गया। इस सन्धि को करवाने का बिस्मार्क का उद्देश्य फ्रांस को यूरोप के देशों से पृथक् रखना था। फ्रैंकफर्ट की सन्धि में फ्रांस को बुरी तरह अपमानित किया गया था। बिस्मार्क ने जर्मनी को यूरोप का सबसे शक्तिशाली देश बना दिया, परन्तु उसकी नीति की यह विफलता थी कि उसने फ्रांस और जर्मनी के मध्य मनमुटाव को बहुत अधिक बढ़ा दिया। प्रथम विश्वयुद्ध का आधारभूत कारण फ्रांस और जर्मनी का यही मनमुटाव बना। जब तक बिस्मार्क जर्मनी का चांसलर रहा, उसने कोई अवसर नहीं आने दिया कि फ्रांस जर्मनी से अपने अपमान का बदला लेने का साहस कर सके। किन्तु 1890 ई० में उसके पद-त्याग करते ही फ्रांस ने गुट निर्माण प्रारम्भ कर दिया।
1890 ई० में बिस्मार्क ने पद त्याग दिया। 1894 ई० में ही फ्रांस तथा रूस ने परस्पर मतभेदों को दूर करके मैत्री सम्बन्धों की स्थापना की तथा दोनों के मध्य द्विपक्षीय गठबन्धन (Dual Alliance) स्थापित हो गया। इस प्रकार 22 वर्षो से निरन्तर फ्रांस का पृथक्करण समाप्त हुआ और मध्य यूरोपीय शक्तियों (इटली, जर्मनी एवं ऑस्ट्रिया) के समानान्तर उसने भी गुट का निर्माण करने में सफलता प्राप्त की। 1907 ई० में इंग्लैण्ड, फ्रांस एवं रूस के मध्य त्रिपक्षीय समझौता (Triple Entente) हो गया। यह गुट जर्मनी के गुट से अधिक शक्तिशाली था और इसके द्वारा फ्रांस 1870 ई० के अपमान का प्रतिकार कर सकता था।
इस प्रकार यूरोप दो गुटों में विभाजित हो गया। प्रथम गुट के अन्तर्गत जर्मनी, ऑस्ट्रियां तथा इटली थे जबकि विरोधी गुट फ्रांस, रूस, इंग्लैण्ड, सर्बिया, बेल्जियम, जापान, संयुक्त राज्य अमेरिका आदि थे जिन्हें संयुक्त रूप से 'मित्र राष्ट्र संघ' जाता था।
2. उग्र राष्ट्रवाद की भावना–सन् 1870 से 1914 ई० के काल में यूरोप महाद्वीप के इंग्लैण्ड, पुर्तगाल, स्पैन, जर्मनी, इटली, फ्रांस, बेल्जियम, हालैण्ड आदि देशों में उग्र राष्ट्रीयता (extreme nationalism) की भावनाएं प्रबल थीं। इन देशों के निवासी अपने-अपने राष्ट्र को सर्वश्रेष्ठ तथा अपनी सभ्यता व संस्कृति को सर्वोच्च समझते थे। फलस्वरूप अनेक राष्ट्रों उत्पन्न पारस्परिक तनाव, घ्रणा, संघर्ष, प्रतिस्पर्धा व द्वेष ने युद्ध की स्थिति उत्पन्न कर दी।
3. फ्रांस तथा जर्मनी की शत्रुता-सन्
1870-71 में फ्रांस तथा जर्मनी के बीच एक युद्ध हुआ था। इसमें जर्मनी ने को पराजित करके उसके अल्सेस और लारेन प्रदेश पर अधिकार कर लिया था। फ्रांस जर्मनी से अपने अपमान का बदला लेने तथा अपने प्रदेशों को वापिस लेने की कोशिश में लगा हुआ था।
4. रूस और तुर्की की शत्रुता-19वीं शताब्दी में रूस और तुर्की के बीच कई बार संघर्ष हो चुके थे। तुर्की अपने रह रही स्लाव नस्ल की जातियों पर अत्याचार कर रहा था जबकि रूस ने उन जातियों का पक्ष लिया था।
रूस तथा तुर्कों को परस्पर शत्रुता (rivalry) ने भी प्रथम विश्वयुद्ध के
लिए पृष्ठभूमि तैयार कर दी थी।
5. जर्मनी और इंग्लैण्ड की शत्रुता-जर्मनी और इंग्लैण्ड में मनमुटाव का कारण आर्थिक साम्राज्यवाद (economic imperialism) था। जर्मनी में बनी वस्तुएँ विदेशी मण्डियों में अपना प्रभुत्व स्थापित कर रही थीं। इससे ब्रिटेन के विदेशी व्यापार को धक्का लगा। इस प्रकार दोनों देशों की औद्योगिक तथा व्यावसायिक उन्नति परस्पर प्रतिस्पर्धा और शत्रुता का कारम गई। बाद में दोनों देशों में युद्ध भड़क उठा।
6. जर्मनी की महत्त्वाकांक्षा–जर्मनी की महत्वाकांक्षा प्रथम विश्वयुद्ध का सर्वाधिक महत्वपूर्ण कारण थी इतिहासकारों के विचार में जर्मनी की नीति ही प्रथम विश्वयुद्ध के लिए मुख्यतया उत्तरदायी थी। संगठित होने के पश्चात् जर्मनी एक महत्त्वपूर्ण यूरोपीय शक्ति बन गया। कैंसर विलियम द्वितीय ने उसे विश्व शक्ति का रूप प्रदान करने के लिए साम्राज्यवादी नीति का अनुसरण किया। कैसर ने कहा था, "मेरा उद्देश्य विश्व-शक्ति प्राप्त करना अथवा पतन के लिए रहना है।" जर्मनी का एकीकरण 1870 ई० तक पूर्ण हुआ, इसलिए उपनिवेश निर्माण में जर्मनी पीछे रहा। वह भी यूरोप के देशों की तरह अधिक से अधिक उपनिवेश स्थापित करना चाहता था। अतः जर्मनी का असन्तुष्ट होना स्वाभाविक था
7. निकट पूर्व की समस्या (बाल्कन समस्या ) – बाल्कन क्षेत्र (Balkan-Area) तुर्की साम्राज्य का यूरोप में पढ़ने वाला क्षेत्र था। इस क्षेत्र में सर्ब, बुल्गेरियन, यूनानी, रूमानियन आदि अनेक जातियों (राष्ट्रीयताओं) के लोग रहते थे। बाल्कन प्रायद्वीप के देश पिछली कई शताब्दियों से तुर्की के आटोमन साम्राज्य के अधीन चल रहे थे। 19वीं शताब्दी के अन्त में आटीमन साम्राज्य का पतन होने लगा। इस परिस्थिति का लाभ उठाकर सर्विया, ऑस्ट्रिया-हंगरी तथा रूस ने आटोमन साम्राज्य के कुछ भागों पर अधिकार करने का प्रयास किया। ऑस्ट्रिया-हंगरी ने सदैव सर्विया का विरोध किया जबकि रूस ने सर्बिया का पक्ष लिया। इन राष्ट्रों के मध्य शत्रुता बढ़ती गयी जो प्रथम विश्वयुद्ध का एक कारण बनी।
1912 ई० में बाल्कन राज्यों (यूनान, सर्बिया, बुल्गारिया तथा माण्टीनीग्रो) ने तुर्की पर आक्रमण करके उसे बुरी तरह पराजित कर दिया। इस प्रकार बाल्कन युद्धों ने भी यूरोप में प्रथम विश्वयुद्ध के लिए आधार तैयार कर दिया।
नोट- बाल्कन क्षेत्र की समस्या इतिहास में पूर्वी समस्या के नाम से जानी जाती है। यह यूरोपीय इतिहास की सर्वाधिक जटिल समस्या रही है। प्रथम विश्वयुद्ध का तात्कालिक कारण इसी क्षेत्र में घटा था।
8. अन्तर्राष्ट्रीय सम्बन्धों पर नियन्त्रण रखने वाली संस्था का अभाव- अन्तर्राष्ट्रीय कानून और सदाचार की संहिता होते हुए भी उन्हें लागू करने की किसी प्रभावी विश्व संस्था का अभाव था। एक गुट में रहते हुये भी राष्ट्र विरोधों गुट के राष्ट्रों में सन्धि कर रहे थे। इटली ने ऐसा ही किया था।
जर्मनी के प्रथम विश्वयुद्ध में पराजय के कारण
सन् 1914 में प्रथम विश्वयुद्ध के प्रारम्भ में जर्मनी की स्थिति अत्यन्त सुदृढ़ थी। उसके पास विशाल सुसगठित शक्तिशाली सेना तथा अस्त्र-शस्त्रों का पर्याप्त भण्डार था। सैनिकों में अनुशासन उच्च कोटि का था। उसके पास खाद्य सामग्री की कमी नहीं थी। फिर भी उसे मुख्यतया निम्न कारणों से युद्ध में पराजित होना पड़ा
1. युद्ध का लम्बा हो जाना— जर्मनी का अनुमान था कि वह एक-दो माह में हो मित्र राष्ट्रों को पराजित कर देगा। किन्तु ऐसा नहीं सका तथा युद्ध चार वर्षों से भी अधिक समय तक चला। इससे जर्मनी के साधनों में कमी आ गई और उसे पराजय का मुंह देखना पड़ा।
2. मित्र राष्ट्रों के पास अधिक साधन- जर्मनी की अपेक्षा मित्र राष्ट्रों के पास जन व धन के कहीं अधिक साधन थे।
3. इंग्लैण्ड की सर्वश्रेष्ठ नौ सेना-इंग्लैण्ड को नौ सेना को विश्व की सर्वश्रेष्ठ नौ-सेना माना जाता था इंग्लैण्ड के जंगी जहाजों सम्मुख जर्मनी के जंगी जहाज टिक नहीं सके।
4. संयुक्त राज्य अमेरिका का युद्ध में प्रवेश करना-6 अप्रैल, 1917 ई० को शक्तिशाली देश संयुक्त राज्य अमेरिका के युद्ध सम्मिलित होते ही युद्ध की स्थिति एकदम बदल गई। इससे मित्र राष्ट्रों की शक्ति अत्यधिक बढ़ गई और जर्मनी क पराजय सुनिश्चित हो गई।
प्रथम विश्व युद्ध के परिणाम
प्रथम विश्वयुद्ध बीसवीं शताब्दी की एक अति भयंकर तथा अत्यंत महत्वपूर्ण एवं दूरगामी घटना थी यह युद्ध पहले के सभी युद्धों से कहीं अधिक विनाशी से दुआ विश्व के सभी भागों से 36 राष्ट्रों ने इसमें भाग लिया इसके अतिरिक्त भुखमरी में महामारी से असंख्य व्यक्तियों को जान से हाथ धोना पड़ा युद्ध में जन एवं धन की अपार क्षति हुई
1.निरंकुश राजवंशों का अन्त - प्रथम विश्व युद्ध के पश्चात् यूरोप के अधिकांश देशों में प्राचीन राजवंशों ( dynastic) की समाप्ति हो गई तथा गणराज्यों (republies) की स्थापना हुई। रूस, जर्मनी एवं ऑस्ट्रिया ने राजतन्त्रों को उखाड़ फेंका और गणतन्त्रों की स्थापना की, प्रजातन्त्रात्मक संविधान तैयार किये गए तथा संसद की स्थापना की गई। टर्की में भी सल्तनत को समाप्त करके तुर्की ने गणतन्त्र की स्थापना की तथा मुस्तफा कमाल पाशा को प्रथम राष्ट्रपति के पद पर आसीन किया। इसके अतिरिक्त पोलैण्ड, लिथूनिया, लैटाबिया, चेकोस्लोवाकिया आदि देशों में भी प्रजातन्त्र की विजय हुई तथा स्वेच्छाचारी शासन के युग का अन्त हो गया।
2. राष्ट्रीयता की भावना का विस्तार-प्रथम विश्व युद्ध के बाद यूरोप ने राष्ट्रीयता की भावना को मान्यता प्रदान का जिसका जन्म फ्रांस की क्रान्ति से हुआ था।
3. राष्ट्रीयता की भावना केवल यूरोप में ही नहीं, वरन् विश्व के अन्य भागों में भी फैली। अफ्रीका एवं एशिया के विभिन्न भागों में इसका प्रसार हुआ तथा परतन्त्र देश स्वतन्त्रता प्राप्ति के लिये आन्दोलन करने लगे। चीन में इसी भावना के कारण जागरण प्रारम्भ हुआ, मिस्त्र (Egypt) में इसी कारण विवश होकर 1922 ई० में अंग्रेजों को अपना संरक्षण समाप्त करना पड़ा तथा टर्की ने अपने देश का पुनरुत्थान किया।
4. आत्म-निर्णय का अधिकार राष्ट्रीयता की भावना के आधार पर अमेरिका के राष्ट्रपति विल्सन ने आत्म निर्णय (self determination) के सिद्धान्त को जन्म दिया। इसी सिद्धान्त के अनुसार नवीन राष्ट्रीयता का यूरोप में अभ्युदय हुआ।
5. अधिनायकों का उदय- शान्ति सम्मेलन के निर्णय से अनेक राष्ट्र अत्यधिक असन्तुष्ट थे। जर्मनी के प्रति विजेताओं का व्यवहार अमानवीय था। इसके फलस्वरूप असन्तुष्ट देशों में अधिनायकों (dictators) का आविर्भाव हुआ जिन्होंने राष्ट्रीय अपमान का बदला लेने का आश्वासन देकर राष्ट्र की समस्त शक्तियों को अपने हाथों में ले लिया। केवल यूरोप में ही नहीं, विश्व के अन्य भागों में भी अधिनायकों का अभ्युदय (rise) हुआ। रूस में साम्यवाद, जर्मनी में नाजीवाद, इटली में फासीवाद के निर्माता क्रमशः अधिनायक लेनिन, हिटलर और मुसोलिनी थे। टर्की में कमालपाशा ने तानाशाही स्थापित की, स्पेन में फ्रैंकों का उत्कर्ष हुआ, जापान में भी तानाशाही का आविर्भाव हुआ। ये सभी देश, जहाँ अधिनायको का अभ्युदय हुआ, पेरिस सम्मेलन के निर्णय से असन्तुष्ट थे।
5. समाजवाद का विकास-प्रथम विश्वयुद्ध के पश्चात् समाजवाद (socialism) एव साम्यवाद (communism) विकास हुआ। कारखानों में काम करने वाले श्रमिकों ने पूँजीपतियों के अत्याचारों के विरुद्ध आन्दोलन प्रारम्भ किए। श्रमिकों के संघों(WTO) को समस्त विश्व में मान्यता प्रदान की गई तथा उद्योग-धन्धों के पूर्ण राष्ट्रीयकरण का प्रयोग रूस में बोल्शेविक सरकार ने प्रारम्भ किया। रूस के समाजवादी प्रयोगों का प्रभाव विश्व पर पड़ना स्वाभाविक था। श्रमिकों की चिकित्सा, अनिवार्य जीवन-बीमा, क्षतिपूर्ति, बोनस आदि की व्यवस्था को कई देशों में लागू किया गया। मजदूरों को मिल मालिकों के विरुद्ध संगठन (union) बनाने एवं हड़ताल करने के अधिकार प्रदान किए गए
6. वैज्ञानिक प्रगति- प्रथम विश्वयुद्ध में अनेक भयंकर तथा नवीनतम आविष्कृत यन्त्रों का प्रयोग किया गया था। देको या हवाई जहाजों का प्रयोग सर्वप्रथम इसी युद्ध में हुआ। अनेको विषैली गैस तथा पनडुब्बियों का भी प्रयोग किया गया। रिणामस्वरूप अनेक देशों में युद्ध के नवीन अस्त्र-शस्त्रों के निर्माण की परस्पर होड़ लग गई, जिस कारण विज्ञान क अत्यधिक विकास हुआ।
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1 टिप्पणियाँ
Very useful sir✌️✌️
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